नाटक- भारत खान की कुर्बानी
लेखक- निर्देशक - रवि कुमार गुप्ता
दृश्य-01
( पर्दे के पीछे से चुनावी रैली की आवाज आती है और सभी लोग बोलते हैं जिन्दाबाद, जिन्दाबाद नेताजी जिन्दाबाद )
मंच के ऊपर प्रकाश -
चमचा - "जबतक नेताजी का नाम रहेगा, तबतक रोटी दाल मिलेगा "
(सभी लोग बोलते हैं जिन्दाबाद, जिन्दाबाद नेताजी जिन्दाबाद )
भारत खान ( पत्रकार) - वोट करो, वोट करो... राजतंत्र पर चोट करो.
निर्भया देवी (महिला नेता) - चुनाव ही गहना हैं, इससे ही सजना हैं.
रामरूप ( बुजुर्ग नेता) - वोटिंग मशीन का बटन दबा कर बहुत अच्छा लगा, मरते दम तक वोट करूंगा और करूंगा .
रसीद गटकू ( राष्ट्रीय नेता) - देखिये इस बार हमारी पार्टी युवाओं व महिलाओं को उम्मीदवार बनाएंगी और हम सब अब गरीबी को देश से बाहर निकाल कर दम लेंगे. बस आप सब हमें ही वोट दीजियेगा और हम आपको, पता तो होगा ही की क्या देंगे, बस एक बार हमें जीताइए.
रणवीरा ( छात्र) - मैं अपने पढाई को छोड़कर लोकतंत्र को मजबूत करने आया हूँ तो आप भी आइए और देश को जीताइए.
रामरूप - तो सब मिलकर गाओ, चलो जवानों चलो चलो..........
रसीद गटकू ( रामरूप के कान के पास बोला) - सिर्फ इस गली के वोट से नहीं जीत जाओगे और भी कई जगह हैं जल्द चलो, बङा बदबू हो रहा हैं.
रणवीरा - ठीक है तो भूलिएगा मत क्योंकि आप ही तो देंगे पूर्णं बहुमत.
( रसीद गटकू हाथ जोड़कर निकलता है और सब नारेबाजी करते हैं, जिन्दाबाद, जिन्दाबाद नेताजी जिन्दाबाद करते हुए निकलते हैं )
पागल ( भागते हुए और चुनावी पम्पलेट उठाकर बङबङाता हैं ) - फिर चुनाव का हल्ला अब फिर बम पटाखा फटेंगे , मैं घर से बाहर नहीं निकलूँगा और कहीं नहीं जाऊंगा. आपने देखा था ना कैसे उनके साथियों ने मेरा हाथ तोङ दिया था, ऐसे ऐसे करके ( हाथ मोङकर बोला). क्योंकि मैंने अपने मन से वोट दिया था इसलिए और मुझे कोई नहीं बचाया सब तो मजा ले रहे थे क्योंकि मैं तो पागल हूँ ( हँसने लगा), पर मेरी बीवी मुन्नी की माँ तो बचाने आई थी मुझे फिर क्या हुआ था ( याद करने लगा), हाँ.! उसको भी तो मारा था कलुआ ने, मैं क्या करता क्योंकि हाथ तो टूट गया था पर मुन्नी तो पत्थर से मारी थी और फिर कटारी उसको क्या किया, ले गया उठा कर ( रोने लगा), और मैं तो पुलिस के पास गया पर वो लोग मुझे दस रुपये दे कर भगा दिये और मेरी सुनेगा कौन क्योंकि मैं तो पागल हूँ, हाँ हाँ हाँ हाँ हाँ..... नहीं नहीं मुन्नी और उसकी मां मेरी बात सुनते हैं. अरे! ये नेता सब मेरे घर के तरफ जा रहे हैं, मुन्नी मुन्नी दरवाजे बंद कर लो, छुप जाओ ( चिल्लाते हुए भागता हैं)
दृश्य - 02
( बगल के घर से आवाज आती हैं )
एक औरत -लग रहा हैं कि सेल लगा है (भून भूनाते हुए कहा). अरे! फेंकूओ का हर समय घर में हल्ला मचाया रहता है, नेतवन के जैसा. बाहर चुनाव का हल्ला आ घर में न्यूज का..... इ सब देख के ना तू नेता बनेगा आ ना ही बड़ा आदमी, गरीब का बच्चा हो...)
लड़का( माँ की बात काटते हुए) - बस बस,अब यही बोलोगी की चपरासी बनूंगा, ठीक है माँ. और फिर पढने जाने को मत कहना क्योंकि चुनाव के रैली - रैला के वजह से सब चालू हो के भी बंद है.
माँ - ठीक है तो जाओ बापे के तरह रैली - वैली में घुम दो, कम से कम १०० रूपया तो मिलेगा, काहे की मेहनत के नाम पर तो तू बीमार ही हो जाता है.
फेंकू(लङका) - मुझे नहीं जाना, बेरोजगारी भत्ता तो मिल रहा है ना.
माँ - ठीक है जो करना है करो, हमरा का है, खाना बनाना है और परोसना है. ( झनक कर चल जाती है)
फेंकू - ठीक है तो जाओ, मुझे मेरा काम करने दो.
( लड़का फिर अपने आप में मग्न हो जाता है )
दृश्य -03
पागल ( गीत गाते हुए, मस्तमौला अंदाज में ) -
आजा हो रामा, गाँधी के गांव में.....
की अब ना कोई वीर, हमरे गांव में
आजा हो रामा, आजा हो..........
की हम है राम भरोसे, की सब है राम भरोसे......
( नेता रसीद गटकू अपने चमचों के साथ निकलता है और फोन पर बात करते हुए बोला) - ठीक है, मैं भी बस कार्यालय पहुँच रहा हूँ, बस गेट के बाहर ही हूँ.
( पागल अचानक से आगे पङ जाता है)
रसीद गटकू - ए इस पगला को हटा यहां से, मिटिंग के पहले ही मूड का मट्ठा हो गया.
एक चमचा - ( पागल का हाथ पकड़कर के हटाता है)
दूसरा चमचा - पागल को हटाने के लिए, इतना प्यार से पेश आओगे तो यह तुमको ही हटा देगा ( खींचकर हटाता है लेकिन वह टस से मस नहीं हो पाया)
रसीद गटकू - हट, हट .... जबतक मैं हाथ ना लगाऊँ, ना लाश गिरेगा और ना ही वोट. हम लोग यूँ ही हाथ नहीं उठाते, हमारे हाथ उठाने से ही सारे काम हो जाते हैं, उसका हाथ छोड़ और मेरे हाथ का कमाल देख. ( टिफिन से रोटी निकाल कर कुछ दूर फेंका)
पागल -( दौड़ कर जाके रोटी उठा कर खाने लगता है)
सारे चमचे - वाह वाह वाह नेताजी.
रसीद गटकू- वाह वाही करो मत, लोगों से करवाओ.
एक चमचा - वाह वाही की क्या जरूरत हैं, आप तो इस बार पूरा छाए हुए हैं, बाजार से लेकर अखबार तक .
दूसरा चमचा - हाँ, क्योंकि टुकड़े की राजनीति तो पूरी तरह सफल है.
रसीद गटकू - अरे भाई, यह अंग्रेजी निती है, कल भी सफल थी और आज भी है. चलो बाकी बातें अंदर होंगी.
दृश्य - 04
( पत्रकार, नेता रामरूप, युवा नेता, महिला नेता व कुछ मुख्य लोग नेता रसीद गटकू का इंतजार कर रहे हैं)
रसीद गटकू- राम राम रामरूप जी, सलाम खान वीर साहब.
रामरूप - अब राम - सलामी की जरूरत पार्टी में भी.
रसीद गटकू - अरे, नहीं, नहीं, वो क्या है कि चुनावी दौरे का असर है.
खान सिंह (युवा नेता ) - आपसी बातचीत में तो पत्रकार साहब को मत भूलीये.
रामरूप - अब इनको क्या बोलीएगा, सलाम या परनाम ( प्रणाम) हूँ उउ.... हा हा हा हा.....
( सभी लोग हँस देते हैं)
रसीद गटकू - हम क्या बोलें ? पत्रकार साहेब ही बोलेंगे.
रामरूप - इ अइसे ही थोड़े बोलेंगे, कागज के लोग हैं, बिना कागज के क्या बोलेंगे?
भारत खान (पत्रकार) - पर्दे की पीछे की बात को पर्दे पर मत लाइए, क्या पता विपक्ष वाले दीवार बन के सुन रहे हो.
निर्भया देवी (महिला नेता) -डरीए मत पत्रकार साहेब, काहे की, जहाँ पर हम होते हैं, वहाँ विपक्ष भी पक्ष में हो जाता है.
खान सिंह (युवा नेता ) - बहुत खूब, अब दिखा हैं महिला सशक्तिकरण जलवा , वरना अभी तक तो सिर्फ मोमबत्ती ही टिमटिमा रही थी.
निर्भया देवी - हूँ.. उउ.. उबलते खून की यही पहचान हैं, जरा सा गेप क्या मिला कि कमेंट कर दिया.
रसीद गटकू - अरे रे रे ! आप तो दिल पर ले ली, हमारे युवा नेता के बात को, तो फिर दिल्ली पर राज नहीं कर पाएंगे हम सब. और तुम क्या युवा नेता बन गए तो क्या समझ रहे हो पूरी युवा पीढ़ी की वोट तुमसे ही मिलेगी. महिला बल का अंदाजा नहीं है तुमको, यह एक बार बोलेगी और तुम्हारे युवा ही तुम्हारे धज्जियाँ उङा देंगे.
खान सिंह - अच्छा जी तो फिर युवा युवा का माला जपना छोङ दीजिए.
रामरूप - राष्ट्रीय अध्यक्ष से मंच वाली बातें. बेटा तुम ना इसीलिए आज तक किसी पार्टी में टिके नहीं.
खान सिंह - आप तो एक ही पार्टी का झोला ढोते - ढोते, खुद झूल गए और अपने सब्जी का झोला भी अभी तक नहीं बदल पाएं.
रसीद गटकू - आप आने वाले दिनों के नेता के साथ इस तरह पेश आएंगे तो फिर झोला रखने के लिए भी जगह नहीं मिलेगी.
भारत खान - आप तो ऐसे बोल रहे हैं जैसे कि अगले पीएम खान सिंह ही बनेंगे!
खान सिंह - टिकट तो मिलता ही नहीं है, पीएम क्या बात से बन जाऊँगा.
रामरूप - इतना जल्द तो वोटर कार्ड भी नहीं मिलता है बेटा .
रसीद गटकू - मिलेगा मिलेगा, सबको मिलेगा सबकुछ मिलेगा लेकिन हमें इस बार का चुनाव पूर्णं बहुमत से जीतना होगा.
भारत खान - बस एक ठोस मुद्दे को उठाया जाए तब जीत पक्की है. वैसे भी आपके साथ निर्भया और खान सिंह के जैसे जोशीले नेता तो है ना .
रसीद गटकू - वो तो है पर सारी पार्टियां महिला सशक्तिकरण, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी जैसे मुद्दों को लेकर लङती आ रही हैं.
खान सिंह - लेकिन आज तक कोई समाधान तो नहीं दी है, तो क्यों न हम इस बात पर जोर डाले.
रसीद गटकू - बेटा, समाधान का सपना तो गाँधी जी का भी था.
खान सिंह - तो इसे हम पूरा करने में लगे ताकि विकास हो .
रामरूप( हँसते हुए) - समस्या ही मिटा दोगे तो फिर मुद्दे कहां से लाओगे. बेटा बिना भूख के मेहनत करना, किसी को अच्छा नहीं लगता है, समझे.
भारत खान - इसका मतलब यह कि समस्या को समाधान से दूर रहने दिया जाए!
रसीद गटकू - आप बस सुनिए पत्रकार महोदय, बाकी सब बोलने के लिए हम है.
भारत खान - तो फिर मुझे यहां से जाना चाहिए.
रसीद गटकू - अगर आपको जाने देना होता तो शायद इतनी बड़ी गुप्त मीटिंग में आपको क्यों बुलाते.
भारत खान - मेरी आजादी को कोई छीन नहीं सकता है.
रसीद गटकू - हाँ, पर मैंने तो खरीदा है, आपके संपादक ने नहीं बताया है क्या, भारत खान ?
खान सिंह - सर उनको छोङीये और मुद्दे पर चर्चा कीजिए.
रसीद गटकू - बेटा, मैं तो मुद्दे पर ही हूँ, मुझे मत सिखा और भारत खान स्टिंग ऑपरेशन के महारथी, तुमने देश के लिए बहुत कुछ किया है और आगे भी देश के काम आओगे.
भारत खान - कहना क्या चाहते है?
रसीद गटकू - वही जो तुम सूनना नहीं चाहते हो. तुमने टीजेपी का पोल खोल कर के हमारे सपनों पर पानी फेर दिया लेकिन तुम भूल गए कि यहां तो दर्द के मारे भी हम है और दवा के सौदागर भी हम है.
( वाह वाह वाह वाह वाह वाह नेताजी सब बोल पङे )
खान सिंह - लेकिन टीजेपी का भण्डाफोङ से हमें तो फायदा होगा, तो भारत खान को तो हमें सम्मानित करना चाहिए.
रामरूप - सम्मान दो, लेकिन कुर्बानी के लिए भी तैयार रहना, ये सब कागजी लोग हैं जिधर हवा बहेगी, उधर ही घूम जाते हैं.
निर्भया देवी -लेकिन हम सब तो बोलने के लिए है ना "खान सिंह हम तेरी कुर्बानी ज्यां नहीं जाने देंगे".
रसीद गटकू - वाह वाह वाह... क्या बात बोली हो. सचमुच इस कुर्बानी ने ही आजादी दिया और आज भी तो यह वैसे ही है. बेहतरीन प्रदर्शन करने के लिए कुर्बानी तो आरक्षण के जैसे है.
निर्भया - इस बार तो लगता है पूर्ण बहुमत मिल जाएगा. पर वो है कौन जो जान देगा?
रसीद गटकू - जानवरों में कमजोरो की और इंसानो में बहादुरों की बलि सिध्दकारी होती हैं.
निर्भया - चलिए हम तो बच गए.( आह भरके बोली)
रामरूप - आप बच गई तो, हम कहाँ माला पहनने वाले हैं. हम तो यही कहेंगे कि बस रसीद साहेब अपने माला को ढोने का अधिकार हमसे ना छिने.
रसीद गटकू - अरे! यह तो मेरा फर्ज है, रामरूप जी.
खान सिंह - अच्छा जी, मुझे भगत सिंह मत बनाइए. मैं भी लाठी पकङकर चलना चाहता हूं.
रसीद - ठीक है, इधर आओ और माला पहनो ( खान सिंह माला पहन लेता है) ए, भारत फोटो लो.
( भारत खान फोटो खींच लेता है और रसीद गटकू भारत और खान को गले लगा लिया, बोला )
पर क्या करूँ, खान सिंह ? इतिहास तो यह कहता है कि बुढ़ो की कुर्बानी बस एक कहानी लगती है और तुम जैसे ही तो लाते हैं रवानी, रवानी.....
भारत खान(हाथ हटा दिया) - आप रवानी लाइए, मैं चलता हूँ दूसरी कहानी की अोर.
रसीद गटकू - आप जाइए, जाइए बिल्कुल जाइये लेकिन अपने साथ खान सिंह को भी लेते जाइये. लेकिन मैं जहाँ भेजूंगा वहाँ जाइये. कटारी, कालू.... दोनों को भेज दो. ( कटारी और कालू दोनों को पकङ लेते हैं)
भारत को टीजेपी कार्यालय के सामने और खान सिंह को विद्या मंदिर के पास फेंक दो.
खान सिंह - वाह! वाह, नेताजी. लेकिन मेरे युवा दोस्त तुमको छोङेगे नहीं, रसीद गटकू.
रसीद गटकू - वक्त बताएगा. जाओ मुहूर्त हो गया हैं अब जाने का.
पागल (गीत गाते हुए ) - कौन सुनेगा, किसको सुनाए
दवा ही दर्द की वजह बन जाए.........
आजा हो रामा, आजा हो रामा......
जलते सागर से कौन बचाएं.......)
दृश्य - 05
( कुछ युवा वर्ग के लोग व रसीद गटकू शोकाकुल अवस्था में)
रसीद गटकू - मुझे दुख हैं इस बात का की हमारे बीच में क्रांतिकारी पत्रकार भारत खान व युवा वर्ग के नेता खान सिंह विपक्षियों के शिकार हो गए. लेकिन लानत है मुझे खुद पर.
रणवीरा (एक युवक) - सर, हम इस कुर्बानी को ज्यां नहीं जाने देंगे.
( सारे युवक एक साथ बोल पड़े - हाँ! हाँ, भारत खान की कुर्बानी ज्यां नहीं जाएगी)
लेकिन सिर्फ नारेबाजी से नहीं बल्कि हमें परिवर्तन लाना होगा. हम इस बार युवा सरकार लाएंगे.
( सारे युवा - हाँ, हम सब आपके साथ हैं)
रसीद गटकू - हमें फिर एक भारत खान मिल गया हैं, तो इस मौके पर रणवीरा को पार्टी भारत खान घोषित करता हूँ.
रणवीरा - सर , मेरा यह वादा है कि मैं उनके सपनों को पूरा करने में सक्षम रहूंगा. और जरूरत पड़ने पर कुर्बान भी हो जाऊंगा . ( सीना तानकर बोला ) "सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में हैं, देखना है जोर कितना बाजुएँ कातिल में हैं".
रसीद गटकू - बहुत खूब बेटा, वाह वाह! मुझे भरोसा हैं, तुम पार्टी को मजबूत करने में सफल रहोगे .
रणवीरा - लेकिन यह विडियो देखने के बाद मुझे आप पर यकीन नहीं हैं. ( मोबाइल फोन दिखा कर बोला)
रसीद गटकू ( विडियो देखने के बाद चौंका हकलाहट के साथ ) - यह विडियो तुम्हारे पास.
निर्भया देवी( ताली बजाने लगती हैं) - नेताजी, इतिहास यह भी बताता है कि भगत सिंह, बोस, राजगुरु सबको फाँसी पर झूला दिया गया लेकिन कोई रानी कोई देवी आज तक नहीं झूली , चाहे वो झाँसी की हो या फिर काशी की. सबकुछ आपही से सीखा है और घबराईए नहीं, आपकी कुर्बानी भी देश याद रखेगा.
रामरूप - जय हो, जय हो नारी शक्ति की.
रणवीरा - अब आप जयकारे बाद में लगाइएगा, अभी तो कुर्बानी का वक्त हैं. सर क्या करूँ, यही तो आपने सिखाया हैं. दोस्तों इनको गंगा में डुबकी लगाने भेज दो ताकि बाढ के पानी फिर गांव में नहीं आए क्योंकि यह तो गटकू हैं, सब गटक जाएंगे. ( मौजूद युवा रसीद गटकू को जकङ लेते हैं )
रसीद गटकू - लेकिन सिर्फ मेरे मर जाने से क्या देश के सभी रसीद गटकू खत्म हो जाएंगे. क्योंकि यहां पर राम कम और रावण ज्यादा हैं किस - किस को मारोगे, हाँ हाँ हाँ हाँ हाँ...
रणवीरा - हँस ले जी भरकर क्योंकि जान जाने के बाद हँसने का मौका नहीं मिलेगा और हम राम - रावण की नाहीं गिनती करते हैं और ना ही इनके नाम पर राजनीति, तेरी कुर्बानी ही काफी होगी अगले रावण के खात्मे के लिए.
रसीद गटकू - तुम सब धोखा दिये हो मुझे, धोखा. रामरूप तुम भी मेरे साथ ऐसा किए. ( छटपटाहट के साथ)
रामरूप - मैं तो आपके दिए गए काम को पूरी जीवन करूंगा. देखिये अभी भी तो माला ही पकङा हूँ, चलिए पहना भी देता हूँ. ( माला पहना देता हैं)
रणवीरा - चलिए रामरूप जी अब छोङिए माला को क्योंकि हर साल तो इनको माला पहनाना ही हैं, निर्भया जी एक अच्छा - सा फोटो ले लीजिए.
निर्भया देवी - ठीक हैं.
रसीद गटकू ( गिङगिङा कर) - मुझे माफ कर दो, बस एक मौका दे दो.
रणवीरा - मौका तो आजादी के साथ ही मिलता आ रहा हैं. बस रसीद गटकू अब और धोखा ना दो.
रसीद गटकू - अरे! विभीषणों रहम करो.
रामरूप - रहम कर के ही तो आजादी दे रहे हैं तुझे.
रणवीरा - बिल्कुल सही बात कही हैं क्योंकि रावण को मुक्ति तो राम ने दी थी और अब फिर विभीषण के सहारे लंका को रहने दो.
पागल ( गीत) -
किनारे पर बैठे, लहरों की मार सहे हम कबतक
दर - दर फरियाद, करे हम कबतक
अब चलना ही होगा बन के हिमालय
यूँ घूँटते रहोगे, घरों में कबतक...
...... पर्दा गिरता है........